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“नासूर” बनते जा रहे आतंकवाद का ईलाज कब तक ?

साल 2000 में अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले में 30 श्रद्धालुओं की मौत 60 घायल, साल 2001 में हुए हमले में 13 की मौत 15 घायल, साल 2002 में 2 श्रद्धालुओं की मौत और इतने ही घायल, साल 2002 में एक बार फिर हमला इस 10 श्रद्धालुओं की मौत और एक दर्ज़न लोग क़रीब घायल,साल 2006 में एक बार फिर अमरनाथ यात्रियों पर हमला जिसमें 1 की मौत क़रीब 11 साल बाद 10 जुलाई 2017 को अमरनाथ यात्रियों पर हमला 7 श्रद्धालुओं की मौत और कई लोग घायल।

ऊपर दिए गए आंकड़े इस बात की तस्दीक़ कर रहे हैं कि, खोट हमारी सुरक्षा व्यवस्था में नहीं बल्कि भारत के पूरे तंत्र में ही हैं, सरकार की इन्हीं नाकामियों के चलते आतंकवादियों के हौंसले इतने बुलंद हो गए हैं कि, खुल्लेआम धड़ल्ले से हमला करने की धमकी दे देते हैं, और ताज़्ज़ुब इस का बात है कि, इतनी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था होने के बावजूद आतंकवादी घटना को अंजाम देकर सरकार के दावों पर तमाचा जड़ देते हैं। बीती रात अमरनाथ यात्रियों पर हुए आतंकवाद हमला एक जीता जागता उदाहरण है। आतंकवादियों द्वारा किये गए कायराना हमले में 5 महिलाओं समेत 7 लोगों की मौत हो गयी जबकि 19 लोग घायल हो गए। अब सवाल ये नहीं है कि, क़रीब 40,000 हज़ार सुरक्षाकर्मियों, ड्रोन कैमरे, पैट्रोलिंग टीम द्वारा बार- बार गश्त होने के बावजूद आतंकियों ने हमला कैसे कर दिया ? बल्कि सवाल ये है कि, आतंकियों ने खुल्लेआम अमरनाथ यात्रियों पर हमले की धमकी दी, उसके बावजूद भी चूक कैसे हो गयी ? और ऐसे आतंकी हमले कब तक ?

ज़रूरत सरकार को सिर्फ़ “कड़ी निंदा” करने की नहीं बल्कि कड़े क़दम उठाने की है। क्यूंकि जिस तरह से घाटी में आतंकवादी घटनाओं में लगातार इज़ाफ़ा होता जा रहा है वो सरकार के साथ – साथ आम लोगों के लिए ख़ास कर पर्यटकों के लिए चिंता का विषय है। लिहाज़ा सरकार को जल्द से जल्द इस मामले में कोई बड़ा फैसला लेना होगा। अन्यथा आतंकवादी घाव एक दिन नासूर बन जायेगा और समय – समय लोगों को दर्द देता रहेगा।