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नजरिया: नगर निकाय चुनावों में बीजेपी की जीत के मायने

WRITTEN BY- JAYA MISHRA

16 में से 14 मेयर की सीट पर बीजेपी ने जीत दर्जकर सभी विपक्षियों को करारा जवाब दे दिया है,बीजेपी ने ये बात साबित कर दी है कि उनके मुकाबले में कोई भी फिलहाल नहीं है हालांकि इस चुनाव में बहन मायावती ने कमबैक करते हुए दो सीटों पर कब्जा कर लिया इसके अलावा बीजेपी के आसपास ना ही कांग्रेस टिक पाई है और ना ही सपा।

अब सवाल उठाता है कि केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए इस जीत के क्या मायने हैं? इस जीत का गुजरात चुनाव पर क्या असर होगा और सबसे बड़ा सवाल की 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर इस जीत का कैसा असर पड़ेगा? इस नगर निकाय चुनाव की पूरी पटकथा पर अगर नजर डाली जाए तो एक बात तो साफ हो जाती है कि आज तक स्थानीय निकाय चुनाव कभी इस पैमाने पर लड़े नहीं गए, इन चुनावों को इस स्केल पर ले जाने का श्रेय सिर्फ बीजेपी को जाता है। वैसे भी बीजेपी को आदत है कि वो हर चीज़ को इतने बड़े स्केल पर ले जाए कि विपक्षी सदमे में आ जाए। इस बार के नगर निकाय चुनाव को देखा जाए तो ऐसा लग रहा था कि विपक्षी पार्टियों को पहले से ही जैसे पता हो कि उनकी हार होनी है इसलिए उनकी तरफ से किसी भी तरह की जोर आजमाइश चुनाव जीतने के लिए नहीं की गई ना बड़े स्तर पर कोई चुनाव प्रचार ना ही कोई रैली की गई। उलट इसके बीजेपी की बात की जाए तो इस पूरे चुनाव में ऐसा दिख रहा था कि बीजेपी अकेले ही चुनाव मैदान में है, खुद प्रदेश के मुखिया सीएम योगी आदित्यनाथ ने 40 जनसभाएं की दोनों डिप्टी सीएम और कई स्टार प्रचारक इस चुनाव को फतह करने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हुए दिखाई दिए। वहीं कई जगहों पर पीएम मोदी भी चुनाव में बीजेपी को जीताने की अपील करते हुए दिखें।

विपक्षी पार्टियों का रोल इस चुनाव में ना के बराबर रहा है, समाजवादी पार्टी, जो प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी थी, जिससे उम्मीद थी कि वो सबसे बड़ी चुनौती भारतीय जनता पार्टी को देगी वो शुरू से ही धराशायी नजर आई। इसकी वजह क्या थी किसी को नहीं पता लेकिन कई कयास लगाए गए यहां तक कि ये कहा गया कि अखिलेश यादव योगी से हाथ मिला चुके है। सच्चाई चाहे जो हो लेकिन अखिलेश यादव ने इस चुनाव में एक दिन भी प्रचार ना करके ये बात तो साबित कर दिया था कि वो मन से हार को स्वीकार चुके हैं और मन से जो हार चुका हो उसे हराना दुनिया का सबसे आसान काम है और बीजेपी उस रणनीति को अपनाकर मैदान में डटी रही और आखिरकार किले को फतह कर लिया।

इस चुनाव में बसपा से ज़्यादा उम्मीद नहीं थी क्योंकि बसपा कभी भी इससे पहले नगर निकाय चुनाव अपने सिंबल पर नहीं लड़ती थी, उनके लोगों को इजाज़त दी जाती थी कि वो जाकर निजी तौर पर अपने-अपने सिंबल पर चुनाव लड़ें लेकिन पहली दफ़ा ऐसा हुआ कि मायावती ने ये चुनाव अपने पार्टी सिंबल पर लड़ा और कुछ हद तक बीजेपी को चुनौती दे पाई हालांकि आंकड़ों के हिसाब मायावती काफी पीछे है लेकिन दो सीटें जीतकर उन्होंने ये तो साबित कर दिया कि हार हो चाहे जीत मैदान मैं वो डटी रहेंगी, सपा कांग्रेस की तरह बीजेपी के सामने हथियार नहीं डालेंगी।

कांग्रेस तो जिस तरह की चुनावी रणनीति से चल रही है उससे तो ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस पूरी तरह से खोखली हो चुकी है इस चुनाव में कांग्रेस की ओर से कोई भी बड़ा नेता सड़कों पर नहीं दिखा। सब बयानबाजी और गुजरात के सियासी ड्रामें में मशगुल दिखाई दे रहे थे जिसका नतीजा सामने है और इन नतीजों से कांग्रेस को धक्का नहीं लगना चाहिए क्योंकि जैसी बुआई होगी वैसी की कटाई होगी। कांग्रेस पार्टी गुजरात फतह का सपना तो देख रही है, लेकिन हकीकत ये है कि उनके गढ़ अमेठी में जनता ने उन्हें नकार दिया है। अब ऐसे रिजल्ट के साथ भी अगर राहुल गांधी गुजरात में टॉप करने की बात करते है तो ऐसे में ये यहीं कहा जाता सकता है कि “चल पगले मज़ाक मत करें”।

नोटबंदी, जीएसटी को मुद्दा बनाकर विपक्ष लगातार इस बात का दम भर रहा था कि बीजेपी के इन कुकर्मों का फल जनता उन्हें चुनावों में देगी लेकिन अब तो आंकड़े ये बता रहे हैं कि जनता ने नोटबंदी जीएसटी को पास कर दिया, ऐसे में विपक्ष के लिए जनता का ये एक इशारा भी है कि अब विपक्ष हल्ला करने के लिए कोई और मुद्दा ढ़ूढ़ें।

माना जा रहा है, कि बीजेपी की इस जीत का असर गुजरात चुनाव में भी दिखेगा और आने वाला लोकसभा चुनाव भी बेहद दिलचस्प होगा। विपक्ष जो की पूरी तरह से ढीली पड़ गई है उसे अब जरूरत है कि बीजेपी को मात देने के लिए जुमले और बयानबाजी का हथकंडा छोड़ अभी से कोई पुख्ता रणनीति बनाने में जुट जाए वरना लोकसभा में उनके अच्छे दिन आने से रहे और सत्ता का सपना मृगतृष्णा की तरह हो जाएगा। वहीं ये जीत बीजेपी के लिए चुनौती भी है, क्योंकि अब बीजेपी की जवाबदेही बढ़ जाएगी। अब इनके पास हाउस का समर्थन नहीं होने का बहाना नहीं रहेगा, इनके पास भरपूर बहुमत हर स्तर पर आ गया है ऐसे में विकास के कामों से ये कन्नी नहीं काट सकते और अगर इन्होंने झोल करने की कोशिश की तो साहब ये जनता है, सब जानती है, अगर ये आपको राजा बना सकती है तो ये आपको रंक भी बना सकती है।