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आखिर क्यों अपनी ही पार्टी की आँखों में चुभते थे पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ?

28 जून 1921 को जन्मे भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की आज जयंती है। पीवी नरसिम्हा राव ने ही सबसे पहले आधुनिक भारत के निर्माण की नींव रखी थी। 13 भाषाओं के जानकार राव साहब को साहित्य के अलावा कंप्यूटर प्रोग्रामिंग जैसे विषयों में भी रूचि थी। राजनीतिक जीवन में राव साहब केंद्रीय रक्षा मंत्री और गृह मंत्री जैसे पदों पर भी रहे हैं और 1971 से 1973 तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। राव साहब के राजनीतिक जीवन में तब नया मोड़ आया जब 21 मई 1991 को श्रीपेरंबदूर में कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। इस हत्या के बाद कांग्रेस पार्टी लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। अब राजीव गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस की ओर से अगला प्रधानमंत्री उम्मीदवार कौन होगा ये सवाल गंभीर था क्योंकि सोनीया गाँधी की इस हालत में नहीं थी कि वो प्रधानमंत्री का पदभार संभाल सकें। उस वक्त अर्जुन सिंह ने राव साहब को सबसे मुफीद उम्मीदवार के रूप में देखा जिसके बाद दक्षिण भारत से पहली बार किसी व्यक्ति ने भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और पीवी नरसिम्हा राव साल 1991-1996 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे।

राव साहब को ‘लाइसेंस राज’ की समाप्ति और भारतीय इकोनॉमी में उदारीकरण लाने का श्रेय दिया जाता है क्योंकि जब उस दौर में देश की अर्थव्यवस्था चर्मराने लगी थी, देश दिवालिया होने की कगार पर था तब राव साहब ने नेहरू युगीन समाजवादी अर्थव्यवस्था को दरकिनार करते हुए देश में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू करने का बड़ा फैसला लिया था। जिसके बाद रुपए का अवमूल्यन किया गया, लाइसेंस राज खत्म हुआ और लालफीताशाही पर लगाम लगाई गई। उस वक्त देश के जो हालात थे और राव साहब द्वारा ऐसा निर्णायक फैसला लेना बहुत बड़ी बात थी क्योंकि उस वक्त वर्ल्ड बैंक से उधार लेने के लिए देश का सोना तक गिरवी रखना पड़ा था। राव साहब के फैसले का ही असर है कि आज दुनिया भर में भारतीय बाजार का एक अलग ही रुतबा है।

धीरे-धीरे कांग्रेस की आँखों की किरकरी बन चुके थे राव साहब क्योंकि उन्होंने हमेशा ही वो फैसले लिए जिससे देश का विकास हो और इन्हीं फैसलों में कुछ फैसले ऐसे भी थे जो कांग्रेस को पसंद नहीं आये। राव साहब एक ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्होंने ज़रूरत पड़ने पर दलगत राजनीती को भी दरकिनार कर दिया। ये बात तब की है जब 1994 में पाकिस्तान ने इस्लामिक देशों के समूह ओआईसी के जरिए भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार आयोग (मानवाधिकार काउंसिल) में घेरने की चाल चली और अगर कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप भारत पर साबित हो जाता तो संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद भारत पर तमाम पाबंदियां तो लगने के साथ कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण होना भी लगभग तय था। इसके बाद बेहद ही समझदारी और सूझ-बुझ से इस मामले में राव साहब ने जिनेवा में इस मामले की सुनवाई में प्रतिपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय टीम का मुखिया बना कर भेजा और इस टीम में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला को भी शामिल कराया। इसके साथ ही उन्होंने ईरान और चीन जैसे देश भारत के समर्थन में लाने के लिए अपने विदेश मंत्री दिनेश सिंह को ईरान भेजा जहां चीन के विदेश मंत्री भी पहले से ही मौजूद थे। इस तरह उन्होंने पाकिस्तान की चाल पर ऐसा पानी फेरा कि दुबारा पाकिस्तान ने कभी संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग का दरवाजा नहीं खटखटाया।

राव साहब का राजनीतिक सफर इतना आसान भी नहीं रहा है क्योंकि देश में जब साम्प्रदायिक लड़ाई का माहौल हो तब आगे की राह तय करना काफी कठिन साबित हो जाता है। राव साहब के कार्यकाल में ही बाबरी मस्जिद गिरायी गई थी जिसके बाद पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। साथ ही राव साहब पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए गए थे लेकिन राव साहब ने किसी भी आरोप पर अपना मत नहीं रखा। उनके मत ना रखने की वजह से उन्हें गूंगा प्रधानमंत्री भी कहते हैं। 23 दिसंबर 2004 पीवी नरसिम्हा राव का खराब स्वास्थ्य के चलते निधन हो गया था। उनकी मौत के बाद भी कांग्रेस पार्टी का रवैया उनके लिए वाजिब नहीं था।

गौरतलब है कि, पीवी नरसिम्हा राव का राजनीतिक जीवन काफी कठिन था उन्हीं की पार्टी ने उनके साथ गैरों सा व्यवहार किया इसके बावजूद उन्होंने देश के हित में जो निर्णय लिए वो सराहनीय थे जो आज भी नए भारत के निर्माण में सहायक साबित हुए।