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‘गुप्त नवरात्र ‘ आज से शुरू, जानिए क्या है पूजा विधि ?

 -आचार्य दीपक तेजस्वी 
नवरात्र वर्ष में चार बार आते है-1)चैत्र,  2)आषाढ़, 3) आश्विन और 4) माघ।
देवि-भागवत में लिखा गया है –
चैत्रे आश्विने तथाषाढे, माघे कार्यो महोत्सवः।
नव-रात्रे   महाराज !   पूजा कार्या विशेषतः।।
इस प्रकार चार नवरात्र में चैत्र एवं आश्विन प्रकट और आषाढ़ एवं माघ अप्रकट यानि ‘गुप्त नवरात्र ‘ के नाम से जानी जाती है। गुप्त इसलिए की इन नवरात्र मे गुप्त गुरु-गम्य सिद्धिया प्राप्त करने के लिये साधना-उपासना की जाती हैं।
वैसे देखा जाय तो चारो नवरात्र चार ॠतुओं की सन्धि-वेला में आती है। इस काल में कितने ही लोग बीमार पड़ते हैं और अनेक प्रकार की संक्रामक बीमारियाँ भी फैल जाती है। इसलिए शक्ति अर्जित करने व व्रत-उपवास करके शारीरिक -मानसिक बल प्राप्त करने के लिए सर्व-दुःख-नाशिनी और ऐश्वर्य प्रदायिनी माँ दुर्गा या अपनी  गुरु-परम्परानुसार पूजा आराधना की जाती है।
दुर्गा-सप्तशती के तन्त्रों में अनेक पाठ भेद पाएँ जाते है उनमें से नौ प्रकार के परायण मुख्य रूप से किये जाते है-
1) चण्डीपाठ- प्रथम, मध्यम और उत्तम चरित्र। 
2) महातन्त्र –  प्रथम,  उत्तम,  मध्यम चरित्र। 
3) महाविद्या – मध्यम, उत्तम, प्रथम चरित्र। 
4) सप्तशती-  मध्यम, प्रथम, उत्तम चरित्र। 
5) मृत सञ्जीवनी – उत्तम,  मध्यम, प्रथम। 
6) महाचण्डी – उत्तम,  मध्यम, प्रथम। 
7) रूपचण्डी ( कुमुदिनी )- प्रत्येक श्लोक के साथ ” रूपं देहि.. .. के साथ नवार्ण मन्त्र का प्रतिश्लोक जप। 
8) योगिनी – चौसठ योगिनी के नामोच्चारण के साथ नवार्ण मन्त्र का सम्पुट। 
9) पराचण्डी – ” सौः ” बीज मन्त्र का सम्पुट लगाकर पाठ किया जाता है। 
चण्डी, महातन्त्र, महाविद्या, सप्तशती, मृत सञ्जीवनी और महाचण्डी पाठ विधि में कामनानुसार सम्पुट लगाने की परम्परा है।