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हर साल जून में 3 दिन रजस्वला होती हैं कामाख्या देवी, कुछ ऐसा है चमत्कार….

कामाख्या मंदिर को हिंदुओं का सबसे पुराना मंदिर माना जाता है। नीलांचल पर्वत के बीचो-बीच गुवाहाटी से करीब 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है कामाख्या मंदिर। ये मंदिर प्रसिद्ध 108 शक्तिपीठों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि पिता द्वारा किए जा रहे यज्ञ की अग्नि में कूदकर सती के आत्मदाह करने के बाद जब महादेव उनके शव को लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने उनके क्रोध को शांत करने के लिए अपना सुदर्शन चक्र छोड़कर सती के शव के टुकड़े कर दिए थे। तब जहां सती की योनि और गर्भ आकर गिरे थे, आज उसी स्थान पर कामाख्या मंदिर स्थित है। ये मंदिर तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त करने के लिए भी प्रसिद्ध है।

ऐसी मान्यता है कि हर साल जून के महीने में कामाख्या देवी रजस्वला होती हैं और उनकी योनि से रक्त प्रवाहित होता है। इस दौरान तीन दिनों तक ये मंदिर बंद हो जाता है और उनका दर्शन करना निषेध माना जाता है। गर्भगृह स्थित योनि के आकार के शिलाखंड को सफेद वस्त्र पहनाए जाते हैं, जो पूरी तरह रक्त से भीग जाते हैं। देवी के रजस्वला होने की बात पूरी तरह आस्था से जुड़ी है।

ऐसा कहा जाता है कि कामख्या माँ के बहते रक्त से पूरी ब्रह्मपुत्र नदी का रंग लाल हो जाता है। वहीं बहुत से लोगों का कहना है कि पर्व के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी में प्रचुर मात्रा में सिंदूर डाला जाता है, जिसकी वजह से नदी लाल हो जाती है। वहीं ये भी कहा जाता है कि जानवरों की बलि के दौरान उनके बहते हुए रक्त की वजह से ये नदी लाल होती है।क्या वाकई कामख्या माँ रजस्वला होती हैं। क्या वाकई 3 दिन बाद मंदिर से निकले सफ़ेद कपड़े माँ के रजस्वला से लाल हो जाते हैं ? क्या वाकई नदी का रंग भी इसलिए लाल होता है या सिर्फ ये गहरी आस्था है इस बात का राज़ कोई नहीं जानता और शायद जान भी नहीं पाएगा। क्योंकि ये मंदिर के कपाटों में बंद एक ऐसा रहस्य है जो हमेशा रहस्य ही बना रहेगा।