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कृपया ध्यान दें ! इस ख़बर को कमज़ोर दिल वाले न पढ़ें, प्राचीन काल में ऐसे दी जाती थी मौत

मौत एक ऐसा सत्य है जिसके आने से पहले इंसान की रूह थर्रा उठती है, और अगर ये मौत क्रूर हो तो देखने वाले का भी दिल दहल उठता है। ऐसा ही कुछ प्राचीन काल में भी किया जाता था। दरअसल, इंसानी इतिहास में अपराधियों और दुश्मनों को मौत देने के लिए ऐसे तरीके इस्तेमाल किए जाते थे, जिनमें आदमी तिल-तिल करके करोड़ों बार मरता था। ऐसे ही कुछ प्राचीन काल की भयानक मौत से जुडी की जानकारी हम आपको आज देने जा रहे हैं।

नाव में नरक का अहसास

प्राचीन फारस में ऐसी सजा दी जाती थी। इसमें अपराधी को एक नाव में बांध दिया जाता था। उसे जबरदस्ती ढेर सारा दूध और शहद पिलाया जाता, ताकि उसे दस्त शुरू हो जाएं। फिर उसके शरीर पर भी दूध-शहद डाल दिया जाता। नाव जंगल के बीच एक तालाब मे रहती थी। दूध और शहद कई तरह की चींटियों, कीड़े-मकोड़ों को आकर्षित करता था। इंसान के दस्त से भी ऐसे जीव वहां बड़ी तादाद में जुट जाते। करोड़ों की संख्या में ये कीड़े-मकोड़े उस इंसान को काटने लगते। धीरे-धीरे उसका शरीर सड़ने-गलने लगता। वह भूख-प्यास से बेहाल हो जाता। इस तरह अंतत: तड़प-तड़प कर उसकी मौत हो जाती।

 

चीन में लिंग ची में होती थी ऐसी क्रूरता

 

 

चीन में 1905 तक लिंग ची कहलाने वाले क्रूर तरीके से मौत की सजा दी जाती थी। इसके बाद इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। लिंग ची के तहत सबसे दुष्ट प्रकार के क्रिमिनल्स को चौराहे पर बांधकर तेज धार वाले चाकू से जगह-जगह काटा जाता था। पहले उसकी छाती और जांघों का मांस काटा जाता। फिर नाक, कान, उंगलियां, लिंग आदि काटे जाते। इस प्रक्रिया में सैकड़ों बार चाकू चलाया जाता। मांस के लोथड़े निकाले जाते। इतना सब होने के बाद भी अपराधी मरता नहीं था, तड़पता रहता, तो चाकू से उसका दिल निकाल लिया जाता। अगर शासक को किसी अपराधी पर थोड़ी-बहुत दया आ जाती, तो लिंग ची से पहले उसे अफीम पिला दी जाती थी, ताकि उसे दर्द का अहसास कम हो।

तोप के मुंह पर बांधकर उड़ा देना

यह सजा 19वीं सदी तक प्रचलित थी। अंग्रेजों ने कई हिंदुस्तानियों को इस तरह तोप के मुंह पर बांधकर उड़ा दिया। इस सजा में व्यक्ति के तत्काल चीथड़े उड़ जाते थे और वह तड़पता नहीं था। हमारे कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हंसते-हंसते तोप के मुंह पर बंधे थे।

भट्ठी पर तड़पा-तड़पा कर मारना

 

यह आग में जलाने से भी ज्यादा क्रूर है, क्योंकि इसमें धीरे-धीरे तड़पकर मौत होती थी। इसमें भट्ठी जैसी संरचना पर व्यक्ति को लिटाकर नीचे से कोयले जलाए जाते थे। जब कोयलों की आंच बढ़कर इंसान के शरीर तक पहुंचती, तो वह धीरे-धीरे गर्म होकर जलता था।

घोड़ों से बांधकर खिंचवाना

यह सजा रोमन साम्राज्य में दी जाती थी। इसमें अपराधी या दुश्मन के हाथ-पैरों को चारों दिशाओं में चार घोड़ों से बांध दिया जाता था। इसके बाद घोड़े विपरीत दिशाओं में ताकत लगाकर चलने लगते। इससे व्यक्ति के हाथ-पैर शरीर से अलग हो जाते और बेहद दर्द तथा शॉक से उसकी मौत हो जाती। इसके बाद घोड़ों के पीछे बंधे हाथ-पैर शहर में घुमाए जाते, ताकि बाकी लोग डरें।

सांड़ के भीतर ठूंसकर भूंजना

यह सजा एथेंस में दी जाती थी। इसके तहत आदमी को एक मैटल के बने खोखले सांड़ के भीतर ठूंसकर ढक्कन बंद कर दिया जाता था। उसके बाद नीचे आग जला दी जाती थी। आग में मैटल धीरे-धीरे तपकर लाल हो जाता और अंदर बंद आदमी तड़प-तड़प कर मरता। सांड़ का मुंह खुला रहता था, जिससे होकर उसकी चीखें बाहर तक आती रहतीं।

इंसान को आरी से चिरवाना

यह सजा मध्यकाल में प्रचलित थी। इसमें व्यक्ति को सीधा खड़े करके या उल्टा लटकाकर, दोनों तरह से आरी से चीरा जाता था। उल्टा लटकाने वाला तरीका ज्यादा दर्दनाक होता था, क्योंकि तब शरीर लिंग से लेकर पेट तक चिर जाता, लेकिन दिमाग एक्टिव रहता था, इसलिए व्यक्ति को भयंकर दर्द का अहसास होता। चीन में इंसान को बीच से काट दिया जाता था, जिससे उसकी मौत तुरंत हो जाती।