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माँ-बाप की बढ़ती उम्मीदों की नाव पर कहीं ना उम्मीद तो नहीं हो रहे आज के युवा?

आजकल के युवावर्ग में जितनी टेक्नोलॉजी के लिए स्मार्टनेस देखी जाती उतना ही दूसरी ओर आजकल के युवा में हिंसात्मक और नकारत्मक सोच क्राइम को अंजाम देती है। जैसा की हम सभी जानते हैं कि 20 से 25 साल की उम्र ऐसी होती है जिस दौरान अगर किसी लड़के या लड़की के दिमाग़ में चल रहे विचारों का पता लगा सकें तो शायद इन दिनों यूथ द्वारा क्राइम को अंजाम देने की वारदातों में क्यों बढ़ोतरी हो रही है।

दरअसल, इस दुनिया में विभिन्न तरह के परिवार रहते हैं, जिनके यहाँ जन्में बच्चे भी उन्हीं की सिखाई बातों को फॉलो करते हुए आगे बढ़ते हैं। इन्हीं में से कुछ नौजवान सही रास्ते पर चल कर तरक्की पातें हैं तो कुछ ग़लत संगती या हालात की वजह से ग़लत रास्ते पर चलने लगते हैं, वो शायद या तो मज़बूर होते हैं या उन्हें अच्छे बुरे की परख नहीं होती।

ये तो हो गयी सही या ग़लत की बात मतलब आर या पार, पर इन्ही युवाओं में कुछ ऐसे होते हैं जो जीवन में कुछ करने की चाह तो रखते हैं पर कुछ कारणों की वजह से वो न ही कुछ सही कर पाते हैं और न कुछ गलत। कारण का तात्पर्य ये नहीं कि उनको कोई रोकता है या फिर वो नहीं कर सकते, यहां कारण का तात्पर्य है कुछ ऐसी बातें जिनकी वजह से वो कोई काम खुल के नहीं कर पाते। वो हर वक़्त किसी न किसी सोच में होते हैं जो उन्हें किसी भी काम को करते वक़्त उन्हें परेशान करती है। असल में ये सोच सिर्फ़ एक भ्र्म होता है जो कि हमारे गुज़र रही दिनचर्या से उत्पन्न होती है। दरअसल, 20 से 25 साल के बीच पैसा कमाने की होड़ सबको रहती है पर कोई अपनी पसंद को त्याग के पैसा कमाता है और कोई ज़िंदगी के मज़े लेते हुए पैसा कमाता है और इन्हीं में से कुछ ऐसी भी होते हैं जिसका 25 साल तक भी कोई लक्ष्य नहीं बन पाता। उन्हें बस उनके मनपसंदके कार्य करना अच्छा लगता है। हालांकि, पैसे कमाने की इच्छा उनकी भी होती है पर ऐसे कुछ गिने-चुने ही लोग होते हैं जो अपने जीवन के लक्ष्य को समझ नहीं पाते।

ऐसे व्यक्तियों से पहली बार मिलकर हमारी प्रतिक्रिया होती है कि ये व्यक्ति पागल है या किसी और दुनिया में खोया-खोया रहता है ,ये वही लोग होते हैं और किसी और दुनिया में नहीं बल्कि जो सिर्फ अपनी सोच में खोये रहते हैं। उनकी सुबह सोचने से ही शुरू हो जाती है और दिनभर ये प्रक्रिया चलती रहती है। कभी-कभी हम किसी ऐसे व्यक्ति से भी मिलते हैं जो पहले बहुत चहल-पहल में रहते हैं पर एकदम से ही शांत हो जाते हैं। इसके पीछे भी यही कारण है कि वो अपनी सोच में इतना खो जाता है कि उसकी सोच उसपर हावी हो जाती है और उसमे डर के साथ असहजता भर देती है और नतीजतन वो कभी-कभी सहमा हुआ नज़र आता है।

वो अपने हर कार्य को करने से पहले ही उसके रिज़ल्ट्स सोच लेता है और परिणामस्वरूप वो कभी अपना सौ प्रतिशत नहीं दे पाता। ऐसे व्यक्तियों का इतनी गहन सोच में डूबने का कारण कहीं न कहीं उनके परिवार का वातावरण और उनके मित्रों का व्यवहार और उनकी कही बातें उनके दिल व दिमाग पर खास असर डालती है।

कहीं न कहीं हम देखें तो जब युवा अपने माँ-बाप की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाते और न ही अपनी चाहत को पूरा कर पाते हैं। वो अपनी चाहत और अपने माँ-बाप की उम्मीदों में कभी-कभी दब कर रह जातें है। जिसके बाद वो न ही अपने कार्य में मन लगा पाते हैं और न ही अपने लक्ष्य पर एकाग्र होकर आगे बढ़ पाते हैं। वो सिर्फ अपनी नाकामयाबी और उम्मीदों के टूटने की वजह को ही अपनी हार मान लेते हैं।