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पेरिस जलवायु समझौते से पीछे हटा अमेरिका, जाने इसका क्या होगा समझौते पर असर

अमेरिका ने पेरिस जलवायु समझौते से अपना हाथ पीछे खींचने का फैसला किया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने ये फैसला ये कहकर लिया कि इससे अमेरिका के उद्योगों और रोजगार पर बुरा असर पड़ेगा और इस समझौते से भारत और चीन जैसे विकासशील देशों को ज्यादा फायदा होगा। ट्रंप ने कहा कि वो चाहते हैं कि पेरिस जलवायु समझौता अमेरिका के लिए उचित समझौता हो.

क्या है पेरिस जलवायु समझौता?

जलवायु परिवर्तन पर यूएनएफसीसीसी (UNFCCC) में शामिल सदस्यों का सम्मेलन कान्‍फ्रेंस ऑफ पार्टीज (COP) कहलाता है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने और पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन के खतरे से बचाने के लिये वर्ष 1994 में इसे बनाया गया था। वर्ष 1995 से सीओपी के सदस्य हर साल मिलते हैं.  साल 2015 में इसके सदस्‍य देशों की संख्या 197 थी। दिसंबर 2015 में सम्‍मेलन के दौरान जिन चीजों पर सहमति बनी और जो एक दस्‍तावेज के रूप में सभी देशों के सामने आया था उसको ही पेरिस जलवायु समझौते का नाम दिया गया था।

ओबामा थे इस समझौते के पक्ष में

साल 2015 में करीब 200 देशों के बीच पेरिस जलवायु समझौता हुआ था जिसके तहत इन सभी देशों को बढ़ते कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए और ग्लोबलवॉर्मिंग को दो डिग्री सेल्सियस तक नीचे लाने का लक्ष्य दिया गया था. फिलहाल, ग्लोबलवॉर्मिंग 1.5 डिग्री सेल्सियस कम करने के लिए प्रयास किये जाने की बात हुई थी. बता दें कि, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सितंबर 2016 में इस समझौते पर हस्ताक्षर किया था। जिसके तहत अमेरिका को गरीब देशों को तीन बिलियन डॉलर सहायता राशि देने पर सहमति बनी थी। 4 नवंबर 2016 से यह समझौता लागू भी हो गया था लेकिन अब वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इस समझौते से अब बाहर निकलने का ऐलान कर दिया है.

अमेरिका के बाहर जाने से क्या होगा असर?

भारत विश्व में ग्रीन हाउस गैसों का उत्‍सर्जन करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है। वहीं इस कड़ी में चीन पहले नंबर पर है। भारत विश्व के 4.1 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। वहीं दुनिया के कार्बन उत्सर्जन का करीब 15 फीसदी हिस्सा अमेरिका से आता है। अमेरिका के पीछे हटने से इस समझौते पर काफी असर पड़ेगा। साथ ही अमेरिका से गरीब देशों को मिलने वाली राशि पर भी अभी सवाल बना हुआ है.